क़िस्मत तो देख टूटी है जा कर कहाँ कमंद
कुछ दूर अपने हाथ से जब बाम रह गया
ऐ काश हमारी क़िस्मत में ऐसी भी कोई शाम आ जाए
इक चाँद फ़लक पर निकला हो इक चाँद सर-ए-बाम आ जाए
हम ही उन को बाम पे लाए और हमीं महरूम रहे
पर्दा हमारे नाम से उट्ठा आँख लड़ाई लोगों ने
मैं ही उन्हें छत तक ले आया, फिर भी मैं ही उनसे वंचित रह गया।
जैसे ही मेरे नाम की ओट हटी, लोगों ने उन्हें देखकर आँखें लड़ानी शुरू कर दीं।
कवि उस कड़वे विरोधाभास को कहता है कि जिसे उसने ऊपर उठाकर सबके सामने किया, उसी का फल उसे नहीं मिला। “छत” यहाँ ऊँचाई और लोगों की नज़र में आने का संकेत है, और “पर्दा उठना” मतलब बात का खुल जाना। नाम सामने आते ही लोग बेधड़क होकर प्रिय की ओर लपकने लगे, और प्रेमी की मेहनत उसके लिए अपमान बन गई। भाव में अधूरापन, कृतघ्नता और चोट खाया हुआ प्रेम है।
अब ख़ाक उड़ रही है यहाँ इंतिज़ार की
ऐ दिल ये बाम-ओ-दर किसी जान-ए-जहाँ के थे
आँखों में दमक उट्ठी है तस्वीर-ए-दर-ओ-बाम
ये कौन गया मेरे बराबर से निकल कर
इक बर्फ़ सी जमी रहे दीवार-ओ-बाम पर
इक आग मेरे कमरे के अंदर लगी रहे
इक दास्तान अब भी सुनाते हैं फ़र्श ओ बाम
वो कौन थी जो रक़्स के आलम में मर गई
जल उठे बज़्म-ए-ग़ैर के दर-ओ-बाम
जब भी हम ख़ानुमाँ-ख़राब आए
अहबाब मुझ से क़त-ए-तअल्लुक़ करें 'जिगर'
अब आफ़्ताब-ए-ज़ीस्त लब-ए-बाम आ गया
जब सफ़र से लौट कर आए तो कितना दुख हुआ
इस पुराने बाम पर वो सूरत-ए-ज़ेबा न थी
अल्लाह-रे उन के हुस्न की मोजिज़-नुमाइयाँ
जिस बाम पर वो आएँ वही कोह-ए-तूर हो
एक अंगड़ाई से सारे शहर को नींद आ गई
ये तमाशा मैं ने देखा बाम पर होता हुआ
मुझ को भी जागने की अज़िय्यत से दे नजात
ऐ रात अब तो घर के दर-ओ-बाम सो गए
मैं जानता हूँ मकीनों की ख़ामुशी का सबब
मकाँ से पहले दर-ओ-बाम से मिला हूँ मैं
जुदा थी बाम से दीवार दर अकेला था
मकीं थे ख़ुद में मगन और घर अकेला था
वो सुब्ह को इस डर से नहीं बाम पर आता
नामा न कोई बाँध दे सूरज की किरन में
हम लब-ए-गोर हो गए ज़ालिम
तू लब-ए-बाम क्यूँ नहीं आता
कोई भी सजनी किसी भी साजन की मुंतज़िर है न मुज़्तरिब है
तमाम बाम और दर बुझे हैं कहीं भी रौशन दिया नहीं है