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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

रद करें डाउनलोड शेर

बाम पर शेर

क़िस्मत तो देख टूटी है जा कर कहाँ कमंद

कुछ दूर अपने हाथ से जब बाम रह गया

क़ाएम चाँदपुरी

काश हमारी क़िस्मत में ऐसी भी कोई शाम जाए

इक चाँद फ़लक पर निकला हो इक चाँद सर-ए-बाम जाए

अनवर मिर्ज़ापुरी

हम ही उन को बाम पे लाए और हमीं महरूम रहे

पर्दा हमारे नाम से उट्ठा आँख लड़ाई लोगों ने

मैं ही उन्हें छत तक ले आया, फिर भी मैं ही उनसे वंचित रह गया।

जैसे ही मेरे नाम की ओट हटी, लोगों ने उन्हें देखकर आँखें लड़ानी शुरू कर दीं।

कवि उस कड़वे विरोधाभास को कहता है कि जिसे उसने ऊपर उठाकर सबके सामने किया, उसी का फल उसे नहीं मिला। “छत” यहाँ ऊँचाई और लोगों की नज़र में आने का संकेत है, और “पर्दा उठना” मतलब बात का खुल जाना। नाम सामने आते ही लोग बेधड़क होकर प्रिय की ओर लपकने लगे, और प्रेमी की मेहनत उसके लिए अपमान बन गई। भाव में अधूरापन, कृतघ्नता और चोट खाया हुआ प्रेम है।

बहादुर शाह ज़फ़र

अब ख़ाक उड़ रही है यहाँ इंतिज़ार की

दिल ये बाम-ओ-दर किसी जान-ए-जहाँ के थे

जौन एलिया

आँखों में दमक उट्ठी है तस्वीर-ए-दर-ओ-बाम

ये कौन गया मेरे बराबर से निकल कर

सरवत हुसैन

इक बर्फ़ सी जमी रहे दीवार-ओ-बाम पर

इक आग मेरे कमरे के अंदर लगी रहे

सालिम सलीम

इक दास्तान अब भी सुनाते हैं फ़र्श बाम

वो कौन थी जो रक़्स के आलम में मर गई

सरवत हुसैन

जल उठे बज़्म-ए-ग़ैर के दर-ओ-बाम

जब भी हम ख़ानुमाँ-ख़राब आए

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

अहबाब मुझ से क़त-ए-तअल्लुक़ करें 'जिगर'

अब आफ़्ताब-ए-ज़ीस्त लब-ए-बाम गया

जिगर मुरादाबादी

जब सफ़र से लौट कर आए तो कितना दुख हुआ

इस पुराने बाम पर वो सूरत-ए-ज़ेबा थी

मुनीर नियाज़ी

अल्लाह-रे उन के हुस्न की मोजिज़-नुमाइयाँ

जिस बाम पर वो आएँ वही कोह-ए-तूर हो

नूह नारवी

एक अंगड़ाई से सारे शहर को नींद गई

ये तमाशा मैं ने देखा बाम पर होता हुआ

प्रेम कुमार नज़र

मुझे रहने को वो मिला है घर कि जो आफ़तों की है रहगुज़र

तुम्हें ख़ाकसारों की क्या ख़बर कभी नीचे उतरे हो बाम से

आरज़ू लखनवी

मुझ को भी जागने की अज़िय्यत से दे नजात

रात अब तो घर के दर-ओ-बाम सो गए

अज़हर इनायती

मैं जानता हूँ मकीनों की ख़ामुशी का सबब

मकाँ से पहले दर-ओ-बाम से मिला हूँ मैं

सलीम कौसर

जुदा थी बाम से दीवार दर अकेला था

मकीं थे ख़ुद में मगन और घर अकेला था

जावेद शाहीन

वो सुब्ह को इस डर से नहीं बाम पर आता

नामा कोई बाँध दे सूरज की किरन में

मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल

हम लब-ए-गोर हो गए ज़ालिम

तू लब-ए-बाम क्यूँ नहीं आता

मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम

कोई भी सजनी किसी भी साजन की मुंतज़िर है मुज़्तरिब है

तमाम बाम और दर बुझे हैं कहीं भी रौशन दिया नहीं है

अनवर अलीमी
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