रक़ीब पर शेर
खेल का अस्ल मज़ा तो
तब आता है जब आपका कोई प्रतिद्वंदी भी सामने हो जो जिसकी हार में आपको अपनी जीत, और जिसकी जीत में अपनी हार दिखाई दे। शायरी में रक़ीब इसी प्रतिद्वंदी को कहते है जिसे महबूब की वह इनायतें हासिल होती हैं जिनके लिए सच्चा आशिक़ तड़पता और मचलता रहता है। दरअस्ल रक़ीब उर्दू शायरी का ऐसा विलेन है जिसकी अस्लियत महबूब से हमेशा पोशीदा रहती है और आशिक़ जलने और कुढ़ने के सिवा कुछ नहीं कर पाता। रक़ीब शायरी के इस इन्तिख़ाब से आप सब कुछ ब-आसानी समझ सकते हैः
इस तरह ज़िंदगी ने दिया है हमारा साथ
जैसे कोई निबाह रहा हो रक़ीब से
न मैं समझा न आप आए कहीं से
पसीना पोछिए अपनी जबीं से
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टैग्ज़ : ज़र्बुल-मसलऔर 1 अन्य
ले मेरे तजरबों से सबक़ ऐ मिरे रक़ीब
दो-चार साल उम्र में तुझ से बड़ा हूँ मैं
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टैग : फ़ेमस शायरी
रफ़ीक़ों से रक़ीब अच्छे जो जल कर नाम लेते हैं
गुलों से ख़ार बेहतर हैं जो दामन थाम लेते हैं
जो कोई आवे है नज़दीक ही बैठे है तिरे
हम कहाँ तक तिरे पहलू से सरकते जावें
मुझ से बिगड़ गए तो रक़ीबों की बन गई
ग़ैरों में बट रहा है मिरा ए'तिबार आज
तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का था
न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किस का था
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तुम्हारी चिट्ठी में जो नया सा सलाम लिखा था, वह किसके लिए था?
जब कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था, तो फिर आखिर वह नाम किसका था?
इधर आ रक़ीब मेरे मैं तुझे गले लगा लूँ
मिरा इश्क़ बे-मज़ा था तिरी दुश्मनी से पहले
उस नक़्श-ए-पा के सज्दे ने क्या क्या किया ज़लील
मैं कूचा-ए-रक़ीब में भी सर के बल गया
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उसके कदमों के निशान को सजदा करने ने मुझे बहुत तरह से नीचा कर दिया।
मैं इतना मजबूर हुआ कि मैं प्रतिद्वंद्वी की गली में भी सिर झुकाकर चला गया।
रक़ीब क़त्ल हुआ उस की तेग़-ए-अबरू से
हराम-ज़ादा था अच्छा हुआ हलाल हुआ
जाना पड़ा रक़ीब के दर पर हज़ार बार
ऐ काश जानता न तिरे रह-गुज़र को मैं
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मुझे मजबूरी में दुश्मन (रक़ीब) के दरवाज़े पर हज़ारों बार जाना पड़ा।
काश! मुझे तुम्हारे घर का रास्ता मालूम ही न होता।
जम्अ करते हो क्यूँ रक़ीबों को
इक तमाशा हुआ गिला न हुआ
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आप मेरे दुश्मनों (रक़ीबों) को यहाँ क्यों इकट्ठा कर रहे हैं?
यह तो अब एक तमाशा बन गया है, कोई शिकायत नहीं रही।
बैठे हुए रक़ीब हैं दिलबर के आस-पास
काँटों का है हुजूम गुल-ए-तर के आस-पास
ग़ैर से खेली है होली यार ने
डाले मुझ पर दीदा-ए-ख़ूँ-बार रंग
याद आईं उस को देख के अपनी मुसीबतें
रोए हम आज ख़ूब लिपट कर रक़ीब से
अपनी ज़बान से मुझे जो चाहे कह लें आप
बढ़ बढ़ के बोलना नहीं अच्छा रक़ीब का
हमें नर्गिस का दस्ता ग़ैर के हाथों से क्यूँ भेजा
जो आँखें ही दिखानी थीं दिखाते अपनी नज़रों से
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आपने किसी अजनबी (रक़ीब) के हाथों मुझे नरगिस के फूलों का गुलदस्ता क्यों भिजवाया?
अगर आप मुझे गुस्सा या तेवर ही दिखाना चाहते थे, तो अपनी नज़रों से दिखाते।
आप ही से न जब रहा मतलब
फिर रक़ीबों से मुझ को क्या मतलब
ग़ुस्सा आता है प्यार आता है
ग़ैर के घर से यार आता है
कहते हो कि हमदर्द किसी का नहीं सुनते
मैं ने तो रक़ीबों से सुना और ही कुछ है
हम अपने इश्क़ की अब और क्या शहादत दें
हमें हमारे रक़ीबों ने मो'तबर जाना
रक़ीब दोनों जहाँ में ज़लील क्यूँ होता
किसी के बीच में कम-बख़्त अगर नहीं आता
वो जिसे सारे ज़माने ने कहा मेरा रक़ीब
मैं ने उस को हम-सफ़र जाना कि तू उस की भी थी
गो आप ने जवाब बुरा ही दिया वले
मुझ से बयाँ न कीजे अदू के पयाम को
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मान लिया कि आपने जवाब काफ़ी बुरा/कठोर दिया, फिर भी मैं सह लूँगा।
लेकिन मुझसे दुश्मन/प्रतिद्वन्द्वी का संदेश मत कहिए।
हाल मेरा भी जा-ए-इबरत है
अब सिफ़ारिश रक़ीब करते हैं
ये कह के मेरे सामने टाला रक़ीब को
मुझ से कभी की जान न पहचान जाइए
सदमे उठाएँ रश्क के कब तक जो हो सो हो
या तो रक़ीब ही नहीं या आज हम नहीं
कू-ए-जानाँ में न ग़ैरों की रसाई हो जाए
अपनी जागीर ये या-रब न पराई हो जाए
करूँ किस का गिला कहते हुए भी शर्म आती है
रक़ीब अफ़्सोस अपने ही पुराने आश्ना निकले
आग़ोश सीं सजन के हमन कूँ किया कनार
मारुँगा इस रक़ीब कूँ छड़ियों से गोद गोद
आए हैं ग़ैर को ले कर हम-राह
ऐसे आने से न आना अच्छा
बस एक प्यार ने सालिम रखा हमें यारो
रक़ीब मर गए हम में शिगाफ़ करते हुए
बढ़ेगी बात न बैठेंगे चुपके हम ऐ बुत
रक़ीब से जो करोगे कलाम उठ उठ कर