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मौत पर बेहतरीन शेर

मौत सब से बड़ी सच्चाई

और सब से तल्ख़ हक़ीक़त है। इस के बारे मे इंसानी ज़हन हमेशा से सोचता रहा है, सवाल क़ाएम करता रहा है और इन सवालों के जवाब तलाश करता रहा है लेकिन ये एक ऐसा मुअम्मा है जो न समझ में आता है और न ही हल होता है। शायरों और तख़्लीक़-कारों ने मौत और उस के इर्द-गिर्द फैले हुए ग़ुबार में सब से ज़्यादा हाथ पैर मारे हैं लेकिन हासिल एक बे-अनन्त उदासी और मायूसी है। यहाँ मौत पर कुछ ऐसे ही खूबसूरत शेर आप के लिए पेश हैं।

टॉप 20 सीरीज़

बिछड़ा कुछ इस अदा से कि रुत ही बदल गई

इक शख़्स सारे शहर को वीरान कर गया

ख़ालिद शरीफ़

क़ैद-ए-हयात बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं

मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यूँ

जीवन की क़ैद और दुःख के बंधन असलियत में एक ही चीज़ हैं।

इसलिए मौत आने से पहले इंसान को दुःख से छुटकारा कैसे मिल सकता है?

जीवन की क़ैद और दुःख के बंधन असलियत में एक ही चीज़ हैं।

इसलिए मौत आने से पहले इंसान को दुःख से छुटकारा कैसे मिल सकता है?

मिर्ज़ा ग़ालिब

मौत का भी इलाज हो शायद

ज़िंदगी का कोई इलाज नहीं

शायद मौत का भी कोई इलाज मिल जाए।

लेकिन ज़िंदगी का कोई इलाज नहीं है।

शायद मौत का भी कोई इलाज मिल जाए।

लेकिन ज़िंदगी का कोई इलाज नहीं है।

फ़िराक़ गोरखपुरी

ज़माना बड़े शौक़ से सुन रहा था

हमीं सो गए दास्ताँ कहते कहते

साक़िब लखनवी

कहानी ख़त्म हुई और ऐसी ख़त्म हुई

कि लोग रोने लगे तालियाँ बजाते हुए

रहमान फ़ारिस

मरते हैं आरज़ू में मरने की

मौत आती है पर नहीं आती

हम मरने की इतनी सख्त इच्छा रखते हैं कि उस इंतज़ार में ही मरे जा रहे हैं।

ऐसा लगता है कि मौत रही है, मगर वह आकर भी नहीं आती।

हम मरने की इतनी सख्त इच्छा रखते हैं कि उस इंतज़ार में ही मरे जा रहे हैं।

ऐसा लगता है कि मौत रही है, मगर वह आकर भी नहीं आती।

मिर्ज़ा ग़ालिब

कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा

मैं तो दरिया हूँ समुंदर में उतर जाऊँगा

अहमद नदीम क़ासमी

कम से कम मौत से ऐसी मुझे उम्मीद नहीं

ज़िंदगी तू ने तो धोके पे दिया है धोका

कम से कम मुझे मौत से ऐसी चालाकी की उम्मीद नहीं है।

लेकिन जीवन, तुमने तो एक धोखे पर दूसरा धोखा दिया है।

कम से कम मुझे मौत से ऐसी चालाकी की उम्मीद नहीं है।

लेकिन जीवन, तुमने तो एक धोखे पर दूसरा धोखा दिया है।

फ़िराक़ गोरखपुरी

जो लोग मौत को ज़ालिम क़रार देते हैं

ख़ुदा मिलाए उन्हें ज़िंदगी के मारों से

नज़ीर सिद्दीक़ी

लोग अच्छे हैं बहुत दिल में उतर जाते हैं

इक बुराई है तो बस ये है कि मर जाते हैं

रईस फ़रोग़

मिरी नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ी है ग़ैरों ने

मरे थे जिन के लिए वो रहे वज़ू करते

अज्ञात

मिरी ज़िंदगी तो गुज़री तिरे हिज्र के सहारे

मिरी मौत को भी प्यारे कोई चाहिए बहाना

जिगर मुरादाबादी

ज़िंदगी है अपने क़ब्ज़े में अपने बस में मौत

आदमी मजबूर है और किस क़दर मजबूर है

अहमद आमेठवी

ज़िंदगी इक सवाल है जिस का जवाब मौत है

मौत भी इक सवाल है जिस का जवाब कुछ नहीं

अम्न लख़नवी

ज़िंदगी इक हादसा है और कैसा हादसा

मौत से भी ख़त्म जिस का सिलसिला होता नहीं

जिगर मुरादाबादी

घसीटते हुए ख़ुद को फिरोगे 'ज़ेब' कहाँ

चलो कि ख़ाक को दे आएँ ये बदन उस का

ज़ेब ग़ौरी

रात ख़्वाब में मैं ने अपनी मौत देखी थी

इतने रोने वालों में तुम नज़र नहीं आए

इक़बाल मतीन

कैसे सकती है ऐसी दिल-नशीं दुनिया को मौत

कौन कहता है कि ये सब कुछ फ़ना हो जाएगा

अहमद मुश्ताक़

छोड़ के माल-ओ-दौलत सारी दुनिया में अपनी

ख़ाली हाथ गुज़र जाते हैं कैसे कैसे लोग

अकबर हैदराबादी
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