बुत पर शेर
बुत उर्दू क्लासिकी शायरी
की मूल शब्दावली में से एक है । इसका शाब्दिक अर्थ मूर्ति या मूरत होता है। उर्दू शायरी में ये महबूब / प्रेमिका का रूपक है । जिस तरह बुत कुछ सुनता है न उस पर किसी बात का कोई असर होता है । ठीक उसी तरह उर्दू शायरी का महबूब भी अपने प्रेमी से बे-परवा होता है । आशिक़ की फ़रियाद, उसका रोना, गिड़-गिड़ाना,उसकी आहें सब बेकार चली जाती हैं ।
वफ़ा जिस से की बेवफ़ा हो गया
जिसे बुत बनाया ख़ुदा हो गया
हम ऐसे सादा-दिलों की नियाज़-मंदी से
बुतों ने की हैं जहाँ में ख़ुदाइयाँ क्या क्या
वो दिन गए कि 'दाग़' थी हर दम बुतों की याद
पढ़ते हैं पाँच वक़्त की अब तो नमाज़ हम
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर पुराने प्रेम-रंग और आज की धार्मिक नियमितता के बीच फर्क दिखाता है। “बुत” यहाँ रूपक है—जिसे मन पूजा-सा करता था, यानी प्रिय का आकर्षण। अब वक्त और मन दोनों इबादत के अनुशासन में हैं, इसलिए भाव है: भटकाव से लौटकर भक्ति की ओर आ जाना, और भीतर एक हल्की-सी आत्म-स्वीकृति भी।
क्यूँकर उस बुत से रखूँ जान अज़ीज़
क्या नहीं है मुझे ईमान अज़ीज़
Interpretation:
Rekhta AI
शायर का कहना है कि प्रेम के मार्ग में प्रेमी पर जान न्योछावर करना ही उसका असली धर्म है। अगर वह अपनी जान बचाता है, तो यह प्रेम के प्रति गद्दारी होगी। चूँकि उसे अपना ईमान (वफ़ादारी) जान से ज़्यादा प्यारा है, इसलिए वह ख़ुशी से जान दे देगा।
छोड़ूँगा मैं न उस बुत-ए-काफ़िर का पूजना
छोड़े न ख़ल्क़ गो मुझे काफ़र कहे बग़ैर
Interpretation:
Rekhta AI
मिर्ज़ा ग़ालिब कहते हैं कि वे अपने महबूब की इबादत करना जारी रखेंगे, भले ही समाज इसे मूर्ति-पूजा मानकर उन्हें गलत समझे। उन्हें इस बात की परवाह नहीं है कि दुनिया उन्हें 'काफ़िर' कहती है; उनका प्रेम इन सामाजिक और धार्मिक ताानों से कहीं ऊपर है।
दो ही दिन में ये सनम होश-रुबा होते हैं
कल के तर्शे हुए बुत आज ख़ुदा होते हैं
इलाही एक दिल किस किस को दूँ मैं
हज़ारों बुत हैं याँ हिन्दोस्तान है
हो गए नाम-ए-बुताँ सुनते ही 'मोमिन' बे-क़रार
हम न कहते थे कि हज़रत पारसा कहने को हैं
Interpretation:
Rekhta AI
इस शे’र में दिखावटी धर्म-परायणता पर व्यंग्य है। “बुताँ” से संकेत आकर्षक चेहरों/प्रियजनों की ओर है, और नाम सुनते ही बेचैन होना छिपी हुई इच्छा को उजागर करता है। कवि कहता है कि जो अपने को बहुत पवित्र जताता है, उसकी पवित्रता केवल बातों तक सीमित है; असल में वह भी मोह के आगे डगमगा जाता है।
बे-ख़ुदी में हम तो तेरा दर समझ कर झुक गए
अब ख़ुदा मालूम काबा था कि वो बुत-ख़ाना था
सनम-परस्ती करूँ तर्क क्यूँकर ऐ वाइ'ज़
बुतों का ज़िक्र ख़ुदा की किताब में देखा
नहीं ये आदमी का काम वाइ'ज़
हमारे बुत तराशे हैं ख़ुदा ने
आप करते जो एहतिराम-ए-बुताँ
बुत-कदे ख़ुद ख़ुदा ख़ुदा करते
बुतों को तोड़ के ऐसा ख़ुदा बनाना क्या
बुतों की तरह जो हम-शक्ल आदमी का हो
बुत नज़र आएँगे माशूक़ों की कसरत होगी
आज बुत-ख़ाना में अल्लाह की क़ुदरत होगी
बुत कहते हैं क्या हाल है कुछ मुँह से तो बोलो
हम कहते हैं सुनता नहीं अल्लाह हमारी
ठहरी जो वस्ल की तो हुई सुब्ह शाम से
बुत मेहरबाँ हुए तो ख़ुदा मेहरबाँ न था
त'अना-ज़न कुफ़्र पे होता है अबस ऐ ज़ाहिद
बुत-परस्ती है तिरे ज़ोहद-ए-रिया से बेहतर
अपनी मर्ज़ी तो ये है बंदा-ए-बुत हो रहिए
आगे मर्ज़ी है ख़ुदा की सो ख़ुदा ही जाने
किया इश्क़-ए-मजाज़ी ने हक़ीक़त आश्ना मुझ को
बुतों ने ज़ुल्म वो ढाया कि याद आया ख़ुदा मुझ को
'असग़र' ये सफ़र शौक़ का अब कैसे कटेगा
जो हम ने तराशा था वो बुत टूट गया है
पत्थर को बसाऊँगा नहीं इस में कभी मैं
दिल मेरा हरम है कोई बुत-ख़ाना नहीं है
जो कि सज्दा न करे बुत को मिरे मशरब में
आक़िबत उस की किसी तौर से महमूद नहीं
शिकवा उस बुत के जफ़ा का जो किया मैं तो कहा
तुम तो दुनिया में हो इक अहल-ए-वफ़ा तुम को क्या
थे मेरी राह में लाखों बुतान-ए-नख़वत-ओ-नाज़
कहीं भी सर न झुका तेरे नक़्श-ए-पा के सिवा
कभी जिस पर 'अक़ीदा था हमारा
वो बुत मिस्मार होता जा रहा है
बढ़ेगी बात न बैठेंगे चुपके हम ऐ बुत
रक़ीब से जो करोगे कलाम उठ उठ कर
अपना शहकार अभी ऐ मिरे बुत-गर न बना
दिल धड़कता है मिरा तू मुझे पत्थर न बना