याद पर शेर
‘याद’ को उर्दू शाइरी
में एक विषय के तौर पर ख़ास अहमिय हासिल है । इस की वजह ये है कि नॉस्टेलजिया और उस से पैदा होने वाली कैफ़ीयत, शाइरों को ज़्यादा रचनात्मकता प्रदान करती है । सिर्फ़ इश्क़-ओ-आशिक़ी में ही ‘याद’ के कई रंग मिल जाते हैं । गुज़रे हुए लम्हों की कसक हो या तल्ख़ी या कोई ख़ुश-गवार लम्हा सब उर्दू शाइरी में जीवन के रंगों को पेश करते हैं । इस तरह की कैफ़ियतों से सरशार उर्दू शाइरी का एक संकलन यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है ।
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब
आज तुम याद बे-हिसाब आए
उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो
धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है
एक मुद्दत से तिरी याद भी आई न हमें
और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं
बहुत समय से तुम्हारी याद भी मुझे नहीं आई।
पर ऐसा नहीं कि मैं तुम्हें भूल गया हूँ।
यह दो पंक्तियाँ मन की उलझन दिखाती हैं: याद न आना और भूल जाना एक बात नहीं। बोलने वाला कहता है कि लंबे समय से खयाल नहीं आया, फिर भी मन के अंदर का लगाव खत्म नहीं हुआ। दूरी और चुप्पी के बीच भी प्यार की हल्की मौजूदगी बनी रहती है।
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अच्छा ख़ासा बैठे बैठे गुम हो जाता हूँ
अब मैं अक्सर मैं नहीं रहता तुम हो जाता हूँ
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शाम भी थी धुआँ धुआँ हुस्न भी था उदास उदास
दिल को कई कहानियाँ याद सी आ के रह गईं
शाम का माहौल धुएँ-सा धुंधला था, और सुंदरता भी उदास-सी लग रही थी।
दिल में कई बातें कहानियों की तरह याद-सी आकर वहीं ठहर गईं।
इस शेर में बाहर की धुंधली शाम और भीतर की उदासी एक-दूसरे से जुड़ जाती है। धुआँ-धुआँ वातावरण मन की उलझन और भारीपन का रूपक है, और “हुस्न” का उदास होना बताता है कि खुशी देने वाली चीज़ें भी फीकी पड़ गई हैं। ऐसे समय कई पुरानी, अधूरी बातें याद की तरह उभरती हैं और मन से जाती नहीं—बस चुप-सी टीस बनकर रह जाती हैं।
चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है
याद-ए-माज़ी 'अज़ाब है या-रब
छीन ले मुझ से हाफ़िज़ा मेरा
दिल धड़कने का सबब याद आया
वो तिरी याद थी अब याद आया
क्या सितम है कि अब तिरी सूरत
ग़ौर करने पे याद आती है
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आप के बा'द हर घड़ी हम ने
आप के साथ ही गुज़ारी है
हम तो समझे थे कि हम भूल गए हैं उन को
क्या हुआ आज ये किस बात पे रोना आया
नहीं आती तो याद उन की महीनों तक नहीं आती
मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं
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आज इक और बरस बीत गया उस के बग़ैर
जिस के होते हुए होते थे ज़माने मेरे
तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं
किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं
तुम ने किया न याद कभी भूल कर हमें
हम ने तुम्हारी याद में सब कुछ भुला दिया
तुमने मुझे कभी याद नहीं किया, गलती से भी नहीं।
तुम्हारी याद में मैंने बाकी सब कुछ भुला दिया।
यहाँ प्रेम की एकतरफ़गी साफ दिखती है: प्रिय व्यक्ति को याद करने की फुरसत ही नहीं, जबकि प्रेमी का मन पूरी तरह उसी में डूबा है। “याद” और “भूलना” मन की लगन और प्राथमिकता के रूपक हैं—एक ओर उदासीनता, दूसरी ओर खुद को मिटा देने वाली निष्ठा। इसी असमानता से पीड़ा पैदा होती है।
तसद्दुक़ इस करम के मैं कभी तन्हा नहीं रहता
कि जिस दिन तुम नहीं आते तुम्हारी याद आती है
वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे
तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था
तुम कहते थे कि हम वफ़ा करेंगे, रिश्ता निभाएंगे और तुम्हारी बात मानेंगे।
तुम्हें याद तो है कि ये शब्द किसके थे?
यह शेर पुराने वादों को सामने रखकर आज की बेरुख़ी पर सवाल करता है। पहली पंक्ति में साथ निभाने और बात मानने की कसमें हैं, और दूसरी में तंज भरा याद दिलाना। भाव यह है कि जो वचन दिए गए थे, वही अब टूटते दिख रहे हैं, इसलिए याद को गवाही बनाया गया है।
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ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं
वो कोई दोस्त था अच्छे दिनों का
जो पिछली रात से याद आ रहा है
वही फिर मुझे याद आने लगे हैं
जिन्हें भूलने में ज़माने लगे हैं
तुम भूल कर भी याद नहीं करते हो कभी
हम तो तुम्हारी याद में सब कुछ भुला चुके
आप तो कभी गलती से भी मुझे याद नहीं करते।
और हम हैं कि आपकी याद में दुनिया की हर बात भुला चुके हैं।
इस शेर में शायर महबूब की बेरुखी और अपनी दीवानगी के बीच का अंतर दिखा रहे हैं। शायर शिकायत करता है कि महबूब उसे कभी धोखे से भी याद नहीं करता, जबकि उसने महबूब की यादों में खोकर बाकी पूरी दुनिया को भुला दिया है। यह सच्चे प्रेम में खुद को मिटा देने की भावना को दर्शाता है।
दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने न दिया
जब चली सर्द हवा मैं ने तुझे याद किया
ग़रज़ कि काट दिए ज़िंदगी के दिन ऐ दोस्त
वो तेरी याद में हों या तुझे भुलाने में
कुल मिलाकर, ऐ दोस्त, ज़िंदगी के दिन बस जैसे-तैसे कट गए।
या तो वे तुम्हारी याद में थे, या तुम्हें भूलने की कोशिश में।
यह शेर बताता है कि जीवन का समय एक ही बात में खर्च हो गया—कभी याद में, कभी भूलने के प्रयास में। याद करना और भूलना अलग लगते हैं, पर दोनों में मन उसी व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। “कट गए” से दिन काटने का दर्द और थकान झलकती है। भावनात्मक सार यह है कि बिछोह ने जीने को संघर्ष बना दिया।
याद रखना ही मोहब्बत में नहीं है सब कुछ
भूल जाना भी बड़ी बात हुआ करती है
इस ज़िंदगी में इतनी फ़राग़त किसे नसीब
इतना न याद आ कि तुझे भूल जाएँ हम
उन का ज़िक्र उन की तमन्ना उन की याद
वक़्त कितना क़ीमती है आज कल
कुछ ख़बर है तुझे ओ चैन से सोने वाले
रात भर कौन तिरी याद में बेदार रहा
''आप की याद आती रही रात भर''
चाँदनी दिल दुखाती रही रात भर
याद उस की इतनी ख़ूब नहीं 'मीर' बाज़ आ
नादान फिर वो जी से भुलाया न जाएगा
मीर, उसकी याद में इतना मत डूब; यह कोई इतनी अच्छी चीज़ नहीं।
अरे नासमझ, फिर वह दिल से भुलाई नहीं जा सकेगी।
कवि अपने ही मन को समझा रहा है कि प्रिय की याद को ज़रूरत से ज़्यादा सुंदर मत मानो। लेकिन वह जानता है कि एक बार फिर उसी याद को जगह दी, तो वह दिल पर चिपक जाएगी और मिटेगी नहीं। यहाँ प्रेम की तड़प, पछतावा और बेबस़ी साथ-साथ हैं। याद ही दिल की कैद बन जाती है।
अब तो उन की याद भी आती नहीं
कितनी तन्हा हो गईं तन्हाइयाँ
अब उनकी याद भी अपने-आप मन में नहीं आती।
मेरा अकेलापन इतना बढ़ गया है कि अकेलापन भी अकेला पड़ गया है।
यह शेर जुदाई के बाद के सूनेपन को बयान करता है, जब यादें भी धीरे-धीरे साथ छोड़ देती हैं। यहाँ “अकेलापन” को इंसान की तरह दिखाकर कहा गया है कि तन्हाई इतनी गहरी हो गई है कि दुख का साथी भी नहीं बचता। भाव का केंद्र खालीपन, टूटन और भीतर की चुप्पी है।
जाते हो ख़ुदा-हाफ़िज़ हाँ इतनी गुज़ारिश है
जब याद हम आ जाएँ मिलने की दुआ करना
कोई वीरानी सी वीरानी है
दश्त को देख के घर याद आया
यहाँ एक अजीब तरह का सूनापन और वीरानी छाई हुई है।
जंगल (दश्त) को देखकर मुझे अपने घर की याद आ गई।
शायर का कहना है कि उसके घर का खालीपन जंगल से भी ज्यादा गहरा है। आमतौर पर जंगल वीरान होता है और घर भरा-पूरा, लेकिन यहाँ जंगल की वीरानी को देखकर शायर को अपने घर की याद आती है, जिसका अर्थ है कि उसका घर जंगल से भी ज्यादा वीरान और उजड़ा हुआ है।
वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो
वही यानी वादा निबाह का तुम्हें याद हो कि न याद हो
हम दोनों के बीच जो तय बात और अपनापन था, तुम्हें याद है या नहीं?
यानी साथ निभाने और वफ़ा करने का जो वादा था, तुम्हें याद है या नहीं?
कवि प्रिय से पूछता है कि क्या उसे वह पुराना रिश्ता और आपसी समझ अब भी याद है। “क़रार” यहाँ स्थिरता और तय हुए संबंध का संकेत है, और “वादा निभाह” निष्ठा से साथ देने की प्रतिज्ञा है। “याद हो कि न याद हो” की बार-बार ध्वनि में शिकायत भी है और टूटन भी—जैसे भूल जाना ही बेवफ़ाई हो। यह शेर प्रेम को याद और वफ़ादारी की कसौटी पर रखता है।
जाते जाते आप इतना काम तो कीजे मिरा
याद का सारा सर-ओ-सामाँ जलाते जाइए
चोरी चोरी हम से तुम आ कर मिले थे जिस जगह
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है
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तुम्हारी याद में जीने की आरज़ू है अभी
कुछ अपना हाल सँभालूँ अगर इजाज़त हो
तुम से छुट कर भी तुम्हें भूलना आसान न था
तुम को ही याद किया तुम को भुलाने के लिए
ज़रा सी बात सही तेरा याद आ जाना
ज़रा सी बात बहुत देर तक रुलाती थी
सुना है हमें वो भुलाने लगे हैं
तो क्या हम उन्हें याद आने लगे हैं
वो नहीं भूलता जहाँ जाऊँ
हाए मैं क्या करूँ कहाँ जाऊँ
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किसी सबब से अगर बोलता नहीं हूँ मैं
तो यूँ नहीं कि तुझे सोचता नहीं हूँ मैं
आज फिर नींद को आँखों से बिछड़ते देखा
आज फिर याद कोई चोट पुरानी आई
दुनिया-ए-तसव्वुर हम आबाद नहीं करते
याद आते हो तुम ख़ुद ही हम याद नहीं करते
थक गया मैं करते करते याद तुझ को
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ
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जिस को तुम भूल गए याद करे कौन उस को
जिस को तुम याद हो वो और किसे याद करे